इंदौर15मई2026 आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ (EOW) इंदौर ने केनरा बैंक के साथ हुई 1.70 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मामले में बैंक के तत्कालीन अधिकारियों और एक फर्म के प्रोपराइटर के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की है। आरोपियों ने आपसी सांठगांठ कर नियमों का उल्लंघन करते हुए बैंक को भारी आर्थिक क्षति पहुंचाई और स्वयं अवैध लाभ अर्जित किया।
विवादित भूखंड पर फर्जी दस्तावेज तैयार कर लिया करोड़ों का लोन
एसपी ईओडब्ल्यू रामेश्वर यादव ने जानकारी दी कि जांच में सामने आया है कि आरोपी विमलेश चतुर्वेदी (प्रोपराइटर, मेसर्स ए.वी. ग्राफिक्स) ने इंदौर के मनीष बाग स्थित एक विवादित भूखंड के कूटरचित दस्तावेज तैयार किए। जिस जमीन की वास्तविक कीमत मात्र 23 लाख रुपये थी, उसे सवा करोड़ की फर्जी रजिस्ट्री के जरिए पेश कर बैंक में बंधक रखा गया। आरोपी ने कलर प्रिंटिंग मशीनें खरीदने के नाम पर ₹1.75 करोड़ के टर्म लोन और ₹20 लाख की सीसी लिमिट के लिए आवेदन किया था।
बैंक अधिकारियों ने नियमों को ताक पर रखकर दी मंजूरी
इस धोखाधड़ी में बैंक के तत्कालीन शाखा प्रबंधक तरुण भार्गव, सेक्शन हेड कौशिक कुमार प्रबुद्ध, प्रोसेसिंग अधिकारी खुशबू सिलावट और मंडल प्रबंधक शिमर्ष्ठा सिंह की भूमिका संदिग्ध पाई गई है। शाखा प्रबंधक तरुण भार्गव ने बैंक के सर्कुलर का उल्लंघन करते हुए बिना किसी संयुक्त निरीक्षण के अकेले ही रिपोर्ट तैयार कर दी। वहीं, प्रोसेसिंग अधिकारी ने भी बिना भौतिक सत्यापन के ऑफिस नोट में गलत टीप अंकित की, जिसके चलते महज कुछ ही दिनों में ऋण प्रकरण को हरी झंडी दे दी गई।
मशीनें लगने से पहले ही जारी कर दी राशि
हैरानी की बात यह है कि नियमों के विरुद्ध जाते हुए मशीनें स्थापित होने से पहले ही ₹1.50 करोड़ का टर्म लोन सीधे शाखा से भुगतान कर दिया गया और ₹20 लाख की सीसी लिमिट भी जारी कर दी गई। जांच में पाया गया कि आरोपियों ने जानबूझकर ‘ड्यू डिलिजेंस’ की अनदेखी की और अपने पदों का दुरुपयोग कर भ्रष्टाचार किया।
भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज
ईओडब्ल्यू ने मामले की गंभीरता को देखते हुए आरोपियों के विरुद्ध धारा 420, 467, 468, 471, 120-बी भादवि एवं भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7-(सी) के तहत अपराध पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया है। ईओडब्ल्यू की इस कार्रवाई से बैंकिंग क्षेत्र में हड़कंप मच गया है।





